ब्यूरो चीफ: उमेश पाठक, रीवा
मध्य प्रदेश के रीवा जिले की राजनीति में इन दिनों एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल रहा है। लंबे समय से कांग्रेस पार्टी का परंपरागत समर्थक माने जाने वाला मुस्लिम समाज अब खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर कर रहा है। यह स्थिति न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि पार्टी नेतृत्व के लिए भी एक गंभीर संकेत मानी जा रही है।
मुस्लिम समाज के बीच यह भावना तेजी से उभर रही है कि कांग्रेस पार्टी ने उन्हें धीरे-धीरे हाशिये पर धकेल दिया है। वर्षों तक पार्टी को समर्थन देने के बावजूद अब उन्हें न तो उचित प्रतिनिधित्व मिल रहा है और न ही निर्णय प्रक्रिया में सम्मानजनक भागीदारी। यही कारण है कि समाज के भीतर असंतोष का माहौल गहराता जा रहा है।
इस मुद्दे को वरिष्ठ समाजसेवी और पूर्व विधानसभा प्रत्याशी हाफिज मोहम्मद अली ने भी प्रमुखता से उठाया है। उन्होंने स्पष्ट आरोप लगाया है कि पार्टी लगातार मुस्लिम समाज की अनदेखी कर रही है। उनका कहना है कि यदि कांग्रेस को अपनी जमीनी पकड़ बनाए रखनी है, तो उसे सभी वर्गों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित करना होगा। उन्होंने संवाद की कमी को इस नाराजगी का मुख्य कारण बताते हुए पार्टी नेतृत्व से इस दिशा में ठोस पहल करने की मांग की है।
जिले के मंनगवा और आसपास के क्षेत्रों से भी इसी तरह की आवाजें सामने आ रही हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले जहां संगठनात्मक ढांचे और चुनावी रणनीतियों में मुस्लिम समाज की सक्रिय भागीदारी रहती थी, वहीं अब उनकी भूमिका सीमित होकर औपचारिकता तक रह गई है। कई महत्वपूर्ण बैठकों और कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति या तो नगण्य है या उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज किया जा रहा है।
युवा वर्ग में भी इस मुद्दे को लेकर खासा असंतोष देखा जा रहा है। युवाओं का कहना है कि चुनाव के समय संपर्क करना और बाद में दूरी बना लेना अब स्वीकार्य नहीं है। वे राजनीतिक रूप से पहले से अधिक जागरूक हैं और अपने अधिकारों, प्रतिनिधित्व और सम्मान को लेकर गंभीर हैं। उनका आरोप है कि जिला स्तर पर मुस्लिम समाज को कोई बड़ा पद नहीं दिया गया, जिससे निराशा और बढ़ी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि रीवा जिले में मुस्लिम वोट बैंक हमेशा से कांग्रेस की ताकत रहा है। लेकिन वर्तमान हालात इस आधार को कमजोर करते नजर आ रहे हैं। यदि पार्टी समय रहते इस असंतोष को दूर करने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाती, तो आगामी चुनावों में इसका सीधा असर देखने को मिल सकता है।
इसके अलावा, समाज के लोगों ने यह भी आरोप लगाया है कि उनके खिलाफ हो रहे जुल्म, अन्याय, मॉब लिंचिंग और कथित फर्जी मुकदमों जैसे संवेदनशील मुद्दों पर पार्टी की चुप्पी ने उनकी नाराजगी को और गहरा कर दिया है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या कांग्रेस अपने परंपरागत समर्थकों की उम्मीदों पर खरी उतर पा रही है।
कुल मिलाकर, रीवा की यह स्थिति कांग्रेस पार्टी के लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती बनकर उभर रही है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी नेतृत्व इस संकेत को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या जमीनी स्तर पर संवाद और सहभागिता बढ़ाकर भरोसा दोबारा कायम कर पाता है, या फिर यह असंतोष भविष्य में किसी बड़े राजनीतिक बदलाव का कारण बनेगा।




