Wednesday, February 18, 2026

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अनुभवी गैर-पंजीकृत मेडिकल प्रैक्टिशनरों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार की अपील – गोयल

(परमजीत शर्मा)

मानसा, 17 फरवरी मेडिकल प्रैक्टिशनर्स एसोसिएशन पंजाब के प्रदेश अध्यक्ष धन्ना मल गोयल, सरपरस्त सुरजीत सिंह लुधियाना, महासचिव गुरमेल सिंह माछीके, चेयरमैन एच.एस. राणू, कोषाध्यक्ष राकेश मेहता, वरिष्ठ उपाध्यक्ष जसविंदर सिंह खीवा, अवतार सिंह बटाला, सी.आर. शंकर, प्रेस सचिव चमकौर सिंह और जसविंदर सिंह भोगल ने हाल ही में माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा देशभर के अनुभवी गैर-पंजीकृत मेडिकल प्रैक्टिशनरों के संबंध में दिए गए फैसले पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।
उन्होंने कहा कि पिछले लगभग पचास वर्षों से देश के साढ़े छह लाख से अधिक गांवों और हजारों शहरी गरीब बस्तियों में ये प्रैक्टिशनर 24 घंटे सस्ती, सुलभ और कई बार उधार तक में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराते रहे हैं। ऐसे समय में जब देश की बड़ी आबादी अब भी पर्याप्त सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित है, इस फैसले पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि किसी भी देश की प्रगति उसके स्वस्थ और शिक्षित समाज पर निर्भर करती है। आज़ादी के 78 वर्ष बाद भी देश बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, कुपोषण और अशिक्षा जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। स्वास्थ्य क्षेत्र में स्थिति चिंताजनक है। सरकारी दावों के बावजूद ज़मीनी स्तर पर अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और ग्रामीण डिस्पेंसरी की संख्या जनसंख्या के अनुपात में बहुत कम है। विशेषज्ञ डॉक्टरों, नर्सों, फार्मासिस्टों और आवश्यक उपकरणों की भारी कमी है, और बड़ी संख्या में पद रिक्त पड़े हैं।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार का प्रति व्यक्ति वार्षिक स्वास्थ्य बजट अत्यंत कम है। स्वास्थ्य बीमा योजनाएं मुख्यतः सर्जरी तक सीमित हैं, जबकि दवाइयों और ओपीडी का खर्च मरीज को अपनी जेब से वहन करना पड़ता है, जबकि लगभग 75 प्रतिशत स्वास्थ्य जरूरतें प्राथमिक स्तर और ओपीडी से संबंधित होती हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार एक हजार व्यक्तियों पर एक एमबीबीएस डॉक्टर होना चाहिए, लेकिन देश में स्थिति इससे काफी पीछे है, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की उपलब्धता बेहद सीमित है। आर्थिक तंगी के कारण बड़ी संख्या में लोग महंगी निजी स्वास्थ्य सेवाएं लेने में असमर्थ रहते हैं। कई लोग इलाज के अभाव में दम तोड़ देते हैं, जबकि कुछ अंधविश्वास और झाड़-फूंक का सहारा लेकर अपनी जमा-पूंजी गंवा बैठते हैं।
एसोसिएशन के प्रतिनिधियों ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की कि इस विषय को केवल कानूनी दृष्टिकोण से नहीं बल्कि सामाजिक दृष्टिकोण से देखा जाए। लाखों प्रैक्टिशनरों और उनके परिवारों तथा करोड़ों लोगों की स्वास्थ्य आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए इस फैसले पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि पूर्व में गुरु-चेला प्रणाली के तहत अनुभव के आधार पर पंजीकरण की व्यवस्था थी, जिसे बंद कर दिया गया, परंतु उसका कोई वैकल्पिक प्रबंध नहीं किया गया। अल्पकालिक प्रशिक्षण जैसी व्यावहारिक व्यवस्था पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
कोरोना महामारी, प्राकृतिक आपदाओं और सरकार की विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं — जैसे पल्स पोलियो, परिवार नियोजन, टीकाकरण, मातृ-शिशु देखभाल, एनीमिया एवं एड्स जागरूकता — को घर-घर तक पहुंचाने में इन प्रैक्टिशनरों की अहम भूमिका रही है। साथ ही सामाजिक बुराइयों, नशे और भ्रूण हत्या के खिलाफ जागरूकता फैलाने में भी उन्होंने सक्रिय योगदान दिया है।
उन्होंने पंजाब सरकार से भी आग्रह किया कि चुनाव के दौरान किए गए वादों तथा 26 नवंबर 2024 की पैनल बैठक के निर्णय को ध्यान में रखते हुए इस मुद्दे को सामाजिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए और उपयुक्त प्रशिक्षण देकर इन्हें प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने का कानूनी अधिकार दिया जाए।

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अनुभवी गैर-पंजीकृत मेडिकल प्रैक्टिशनरों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार की अपील – गोयल

(परमजीत शर्मा)

मानसा, 17 फरवरी मेडिकल प्रैक्टिशनर्स एसोसिएशन पंजाब के प्रदेश अध्यक्ष धन्ना मल गोयल, सरपरस्त सुरजीत सिंह लुधियाना, महासचिव गुरमेल सिंह माछीके, चेयरमैन एच.एस. राणू, कोषाध्यक्ष राकेश मेहता, वरिष्ठ उपाध्यक्ष जसविंदर सिंह खीवा, अवतार सिंह बटाला, सी.आर. शंकर, प्रेस सचिव चमकौर सिंह और जसविंदर सिंह भोगल ने हाल ही में माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा देशभर के अनुभवी गैर-पंजीकृत मेडिकल प्रैक्टिशनरों के संबंध में दिए गए फैसले पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।
उन्होंने कहा कि पिछले लगभग पचास वर्षों से देश के साढ़े छह लाख से अधिक गांवों और हजारों शहरी गरीब बस्तियों में ये प्रैक्टिशनर 24 घंटे सस्ती, सुलभ और कई बार उधार तक में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराते रहे हैं। ऐसे समय में जब देश की बड़ी आबादी अब भी पर्याप्त सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित है, इस फैसले पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि किसी भी देश की प्रगति उसके स्वस्थ और शिक्षित समाज पर निर्भर करती है। आज़ादी के 78 वर्ष बाद भी देश बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, कुपोषण और अशिक्षा जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। स्वास्थ्य क्षेत्र में स्थिति चिंताजनक है। सरकारी दावों के बावजूद ज़मीनी स्तर पर अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और ग्रामीण डिस्पेंसरी की संख्या जनसंख्या के अनुपात में बहुत कम है। विशेषज्ञ डॉक्टरों, नर्सों, फार्मासिस्टों और आवश्यक उपकरणों की भारी कमी है, और बड़ी संख्या में पद रिक्त पड़े हैं।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार का प्रति व्यक्ति वार्षिक स्वास्थ्य बजट अत्यंत कम है। स्वास्थ्य बीमा योजनाएं मुख्यतः सर्जरी तक सीमित हैं, जबकि दवाइयों और ओपीडी का खर्च मरीज को अपनी जेब से वहन करना पड़ता है, जबकि लगभग 75 प्रतिशत स्वास्थ्य जरूरतें प्राथमिक स्तर और ओपीडी से संबंधित होती हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार एक हजार व्यक्तियों पर एक एमबीबीएस डॉक्टर होना चाहिए, लेकिन देश में स्थिति इससे काफी पीछे है, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की उपलब्धता बेहद सीमित है। आर्थिक तंगी के कारण बड़ी संख्या में लोग महंगी निजी स्वास्थ्य सेवाएं लेने में असमर्थ रहते हैं। कई लोग इलाज के अभाव में दम तोड़ देते हैं, जबकि कुछ अंधविश्वास और झाड़-फूंक का सहारा लेकर अपनी जमा-पूंजी गंवा बैठते हैं।
एसोसिएशन के प्रतिनिधियों ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की कि इस विषय को केवल कानूनी दृष्टिकोण से नहीं बल्कि सामाजिक दृष्टिकोण से देखा जाए। लाखों प्रैक्टिशनरों और उनके परिवारों तथा करोड़ों लोगों की स्वास्थ्य आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए इस फैसले पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि पूर्व में गुरु-चेला प्रणाली के तहत अनुभव के आधार पर पंजीकरण की व्यवस्था थी, जिसे बंद कर दिया गया, परंतु उसका कोई वैकल्पिक प्रबंध नहीं किया गया। अल्पकालिक प्रशिक्षण जैसी व्यावहारिक व्यवस्था पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
कोरोना महामारी, प्राकृतिक आपदाओं और सरकार की विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं — जैसे पल्स पोलियो, परिवार नियोजन, टीकाकरण, मातृ-शिशु देखभाल, एनीमिया एवं एड्स जागरूकता — को घर-घर तक पहुंचाने में इन प्रैक्टिशनरों की अहम भूमिका रही है। साथ ही सामाजिक बुराइयों, नशे और भ्रूण हत्या के खिलाफ जागरूकता फैलाने में भी उन्होंने सक्रिय योगदान दिया है।
उन्होंने पंजाब सरकार से भी आग्रह किया कि चुनाव के दौरान किए गए वादों तथा 26 नवंबर 2024 की पैनल बैठक के निर्णय को ध्यान में रखते हुए इस मुद्दे को सामाजिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए और उपयुक्त प्रशिक्षण देकर इन्हें प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने का कानूनी अधिकार दिया जाए।

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