ब्यूरो चीफ: उमेश पाठक
रीवा। जिला रीवा के मनगवां थाना क्षेत्र से जुड़े बहुचर्चित वक्फ बोर्ड शपथ पत्र प्रकरण में अपर सत्र न्यायालय रीवा ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए अभियुक्त हाफिज मोहम्मद अली को सभी आरोपों से बाइज्जत बरी कर दिया है। चौदहवें अपर सत्र न्यायाधीश संतोष कुमार तिवारी की अदालत ने लंबी सुनवाई, दस्तावेजी साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का गहन परीक्षण करने के बाद यह निर्णय सुनाया।
न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में असफल रहा, जिसके चलते अभियुक्त को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त किया गया।
क्या था पूरा मामला
जानकारी के अनुसार यह मामला रीवा जिला वक्फ बोर्ड कमेटी में सदस्य बनने के लिए दिए गए आवेदन के साथ लगाए गए स्टांप शपथ पत्र से जुड़ा था। इस मामले में अभियुक्त हाफिज मोहम्मद अली पर जालसाजी और धोखाधड़ी के गंभीर आरोप लगाए गए थे।
यह प्रकरण थाना मनगवां, जिला रीवा में दर्ज अपराध क्रमांक 113/2021 से संबंधित था, जो बाद में एस.टी. क्रमांक 31/2022 के रूप में अपर सत्र न्यायालय में विचाराधीन रहा। अभियोजन पक्ष ने अभियुक्त के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी) और धारा 468 (कूटरचना/जालसाजी) के तहत आरोप लगाए थे। बताया जाता है कि इस मामले की शुरुआत 22 सितंबर 2019 को हुई थी, जिसके बाद पुलिस ने जांच करते हुए 12 अक्टूबर 2021 को न्यायालय में चालान प्रस्तुत किया था।
बचाव पक्ष ने रखा षड्यंत्र का तर्क
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष की ओर से अदालत के समक्ष दलील दी गई कि अभियुक्त हाफिज मोहम्मद अली को एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत झूठे मामले में फंसाया गया है। अदालत में प्रस्तुत दस्तावेजों, गवाहों के बयान और अन्य साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण किया गया, लेकिन अभियोजन पक्ष आरोपों को प्रमाणित करने के लिए कोई ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका।
बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं ने रखी मजबूत पैरवी
अदालत में अभियुक्त हाफिज मोहम्मद अली की ओर से अधिवक्ता फिरोज खान, शशांक सौरभ सिंह एवं उनके सहयोगियों द्वारा प्रभावी पैरवी की गई। बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं ने तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर अदालत के समक्ष अपना पक्ष मजबूती से रखा।
साढ़े छह वर्षों बाद आया फैसला
करीब साढ़े छह वर्षों तक चली लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद अदालत ने 27 फरवरी 2026 को अपना अंतिम निर्णय सुनाते हुए अभियुक्त हाफिज मोहम्मद अली को भारतीय दंड संहिता की धारा 420 एवं 468 के आरोपों से पूर्णतः दोषमुक्त करते हुए बाइज्जत बरी कर दिया।




