ब्यूरो रिपोर्ट: राजेन्द्र खटीक
शाहपुरा, राजस्थान:
शाहपुरा नगर में गणगौर महोत्सव के अवसर पर रियासतकालीन परंपराओं का भव्य प्रदर्शन देखने को मिला। महलों के चौक से गणगौर माता की शाही सवारी राजसी लवाजमे के साथ विधिवत रूप से प्रारंभ हुई। सजे-धजे घोड़े, बैंड-बाजे और पारंपरिक वेशभूषा में सवार दल ने पूरे आयोजन को ऐतिहासिक और आकर्षक बना दिया।
शाहपुरा की गणगौर सवारी की सबसे विशिष्ट परंपरा यह रही कि इसमें ईशर जी की प्रतिमा शामिल नहीं होती, बल्कि केवल माता पार्वती (गणगौर) की प्रतिमा ही नगर भ्रमण करती है। यह परंपरा रियासतकाल से चली आ रही है और आज भी उसी श्रद्धा व आस्था के साथ निभाई जा रही है।
शाही सवारी अपने पारंपरिक मार्ग से गुजरते हुए सदर बाजार और कुंड गेट पहुंची तथा अंत में नरसिंह द्वार पर विधि-विधान के साथ आरती कर सम्पन्न हुई। मार्ग में जगह-जगह श्रद्धालुओं द्वारा पुष्प वर्षा कर माता का स्वागत किया गया, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा।
आयोजन में सांस्कृतिक रंग भी खूब बिखरे। कच्छी घोड़ी, चरी नृत्य और कठपुतली नृत्य जैसी लोक प्रस्तुतियों के साथ कालका माता एवं नृसिंह भगवान की आकर्षक झांकियों ने दर्शकों का मन मोह लिया। बाहरी राज्यों से आए कलाकारों ने भी अपनी प्रस्तुतियों से आयोजन की शोभा बढ़ाई।
गणगौर पर्व विशेष रूप से सुहागिन महिलाओं के लिए अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। महिलाओं ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ माता की पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की।
इस प्रकार शाहपुरा की गणगौर सवारी ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि यहां की सांस्कृतिक परंपराएं आज भी जीवंत हैं और जन-जन की आस्था से गहराई से जुड़ी हुई हैं।




