चंचलेश इन्दौरकर
जिले के अंतर्गत आने वाले आदिवासी ब्लॉक तामिया में पदस्थ श्रीमती बेबी नंदा मेश्राम का जन्म 12 जनवरी 1964 को छिंदवाड़ा जिले के मोहखेड़ तहसील में ग्राम पंचायत बीसापुरकंला में हुआ था। उन्होंने अपनी शिक्षा सरकारी स्कूल महारानी लक्ष्मीबाई छिंदवाड़ा से 12वीं कक्षा तक पूरी की उनकी नौकरी का शुरुआती दोरान में वर्ष 1984 में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के रूप में शुरू हुआ, जहां उन्होंने बिछुआ विकासखंड के अंतर्गत आने वाले ग्राम पंचायत धनेगांव जो कि एक छोटा सा आदिवासी गांव था वहां पर रह कर तीन वर्ष तक महिला एवं बाल विकास विभाग में कार्य किया।
इस भूमिका में उन्होंने महिलाओं और बच्चों के विकास, पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं में महत्वपूर्ण योगदान दिया। कुछ समय पश्चात उनका विवाह 2 जून 1986 को जिले के मोहखेड़ ब्लॉक के ग्राम पंचायत जाखावाडी में हुआ। विवाह के पश्चात उनके तीन बच्चे हुए, दो पुत्र और एक पुत्री ।
इनकी पदोन्नति 16 दिसंबर 1998 को इसी विभाग में सुपरवाइजर के पद पर मिला। उनकी पहली नियुक्ति मोहखेड़ तहसील में हुई था कुछ ही महीनों बाद उन्हें पैरों में तकलीफ होने लगी, जिसके कारण उन्हें स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इसके बाद वर्ष 2001 में उन्होंने अपना निवास स्थान छोड़कर मोहखेड़ तहसील के ग्राम उमरानाला में लगभग 4 वर्ष तक महिला एवं बाल विकास में अपनी सेवा दी। वर्ष 2003 में विभाग द्वारा स्थानांतरित होकर तहसील अमरवाड़ा में 4 वर्ष तक इस विभाग को सेवा प्रदान की। साल 2006 में, जब उनका विभागीय स्थानांतरण तहसील जुन्नारदेव में हुआ, तो उन्होंने महिला एवं बाल विकास विभाग में पूरे समर्पण और लगन से काम किया। वे बच्चों की बेहतरी, माताओं की सुरक्षा और समाज के कमजोर तबके के उत्थान के लिए दिन-रात एक कर रही थीं।
उनका कार्य बहुत सराहनीय था। वे न केवल एक कर्मचारी थीं, बल्कि एक माँ की तरह हर बच्चे की चिंता करती थीं, हर महिला की पीड़ा को समझाती थीं। लेकिन जीवन की यह क्रूर विडंबना है कि जो खुद दूसरों के बच्चों और परिवारों की खुशी-दुख में शामिल होती थीं, उसी के घर में एक दिन ऐसा दुख आया कि सब कुछ जैसे थम सा गया। उनका छोटा बेटा, महज 17 वर्ष का मासूम, अचानक वर्ष 2015 में इस दुनिया से चला गया। वह उम्र जहाँ सपने उड़ान भरते हैं, हँसी गूंजती है, माँ के लिए दुनिया की सबसे बड़ी खुशी होता है-वहीं अचानक छिन गयी। उस दर्दनाक पल में, जब आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे, तब परिवार का साथ, जो सबसे बड़ा सहारा होता है, वो भी न मिल सका।
अकेलेपन की उस गहरी खाई में वे अकेली पड़ गई। जो महिला हर किसी को संभालती थी, आज खुद टूट चुकी थी। फिर भी, कहीं न कहीं उनके अंदर एक माँ की ताकत बाकी थी, जो उन्हें जीने की वजह देती थी। लेकिन वह दर्द कभी पूरा नहीं भरता बस थोड़ा कम होता जाता है, यादों में सिमट जाता है। पढ़ाई के लिए जब बच्चों को घर से दूर रहना पड़ा, तो घर की चारदीवारी में बस एक गहरी खामोशी रह गई। रातें लंबी हो गई थीं, और दिन भी जैसे बीतते नहीं थे। फिर जैसे-तैसे वो संभल रही थीं।
दर्द को दिल के किसी कोने में छिपाकर, रोज सुबह उठकर काम पर जाना, लोगों की मदद करना- ये सब उसे जीने की एक छोटी-सी वजह दे रहा था। लेकिन जीवन ने फिर एक बार करवट ली। वर्ष 2019 आया और विभागीय स्थानांतरण का आदेश आया जी कि जिला सिंगरौली, 700 किलोमीटर दूर था। वो जगह जहाँ ना कोई जान-पहचान, ना परिवार का कोई सहारा। बेटे को खोए अभी तो कुछ ही साल हुए थे दर्द अभी भी ताज़ा था, घाव अभी भी हरा था। पूरी तरह उभर भी नहीं पाई थीं कि ऐसा लगा मानो दूर देश का बुलावा आ गया।दिल बैठ गया। किसी तरह हिम्मत जुटाकर विभाग में अर्जी दी स्थानांतरण स्थगित करने की। चमत्कार हुआ अर्जी स्वीकृत हो गई।
एक साल का वक्त मिला, जैसे थोड़ी साँस मिल गई हो। लेकिन किस्मत ने फिर खेल खेला। ठीक एक साल बाद, अंत में वर्ष 2020 में तहसील तामिया में महिला एवं बाल विकास विभाग की परियोजना में विभागीय स्थानांतरण मिला, तो मन में एक नई उम्मीद जागी थी। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था-कार्यभार संभालने की खुशी, सहकर्मियों का साथ, और उन मासूम बच्चों-महिलाओं की सेवा का संतोष। जीवन जैसे पटरी पर आ गया थी।लेकिन तभी आया वो वैश्विक संकट-कोरोना वायरस। वर्ष 2019 के अंत से शुरू हुई ये महामारी वर्ष 2020 में पूरे विश्व को अपनी चपेट में ले चुकी थी।
लॉकडाउन, डर, अनिश्चितता हर तरफ मौत का साया। दफ्तर बंद, काम ठप, घर में कैद-सा जीवन। फिर भी दिल में एक उम्मीद थी कि ये बीमारी चली जाएगी और सब फिर से सामान्य हो जाएगा। पर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। कोरोना अभी पूरी तरह गया भी नहीं था कि मई 2020 में अचानक लकवा (पैरालिसिस) का प्रकोप हो गया। एक पल में सब कुछ थम-सा गया। शरीर का एक हिस्सा सुन्न, चलना-फिरना मुश्किल, रोजमर्रा के काम भी बोझ लगने लगे। दिन बीतते गए। वर्ष 2020 से वर्ष 2021 तक का लंबा संघर्ष डॉक्टरों के चक्कर, दवाइयां, फिजियोथेरेपी, परिवार का सहारा, और सबसे बड़ी-अंदर की वो जिद कि हार नहीं मानूंगी।
हर सुबह उठकर खुद से कहती,बस थोड़ा और बस थोड़ा और मेहनत। धीरे-धीरे शरीर ने साथ दिया, मर्ज ने पीछे हटना शुरू किया। आराम मिला, ताकत लौटी। और फिर वो खूबसूरत दिन आया जब मैं फिर से जनपद पंचायत तामिया के अंतर्गत आने वाले महिला बाल विकास परियोजना अधिकारी तामिया में लौटी। कार्यालय के दरवाजे से अंदर कदम रखते ही आंखें नम हो गई। वहीं पुरानी कुर्सी, वही फाइलें, वही सहकर्मी जो मुस्कुराकर बोले, आप लौट आई, गैडम और बाहर से बच्चों की वो मासूम आवाजें जैसे सब कुछ रुक गया था, और अब फिर से बह रहा था।ये यात्रा आसान नहीं थी।

इसमें आंसू थे, दर्द था, लेकिन सबसे ज्यादा थी- उम्मीद और हिम्मत। आज जब मैं अपने कार्यभार को फिर से संभाल रही हूं, तो दिल से कहती हूं- जीवन कितना भी कठिन क्यों न हो, अगर इरादा पक्का हो और थोड़ा-सा विश्वास बाकी हो, तो इंसान लौटकर आ ही जाता है मजबूत होकर, और ज्यादा संवेदनशील होकर।ये मेरी कहानी नहीं, बल्कि उस हर उस इंसान की कहानी है जो टूटकर भी टूटा नहीं, और फिर से खड़ा हो गया। वर्ष 2026 आ गया और अब वो पल आ ही गया है, जिसका इंतज़ार दिल कभी नहीं करना चाहता था।
विभाग से विदा ले रही हूं, सेवानिवृत्ति की घड़ी आ चुकी है। 41 वर्ष पूरे 41 वर्ष मैंने इस महिला एवं बाल विकास विभाग को अपनी जिंदगी का सबसे कीमती हिस्सा सौंप दिया। तामिया की उन गलियों से लेकर हर परियोजना, हर बच्चे की मुस्कान, हर मां की आंखों में छिपी उम्मीद तक सब कुछ मेरे दिल में बस गया है। जब वर्ष 2020 में स्थानांतरण मिला था, तो लगा था कि जीवन अब नई शुरुआत करेगा। लेकिन कोरोना आया, लकवा आया, दर्द आया, संघर्ष आया पर मैं रुकी नहीं। हर बार गिरकर उठी, हर दर्द को सहकर आगे बढ़ी। फिजियोथेरेपी के उन लंबे सत्रों में, जब शरीर साथ नहीं देता था, तब भी मन में एक ही बात रहती थी मुझे अपने बच्चों और महिलाओं के लिए वापस जाना है।और मैं लौट आई, मजबूत होकर, और ज्यादा प्यार लेकर। आज जब फाइलें बंद कर रही हूँ, सहकर्मियों की आंखों में वो भाव देख रही हूं जो कह रहे हैं आपकी कमी खलेगी, गैडम तो आंखें भर आती हैं। खुशी है कि मैंने कभी हार नहीं मानी।
संघर्षों ने मुझे तोड़ा नहीं, बल्कि बनाया। मैंने सीखा कि सेवा सिर्फ नौकरी नहीं, एक जुजून है, एक वादा है। अब नई सुबह होगी, जहां सुबह उठकर ऑफिस नहीं जाना होगा, लेकिन दिल में वो सारी यादें रहेंगी- हमेशा। बच्चों की वो मासूम हंसी, माताओं का आशीर्वाद, सहकर्मियों का साथ ये सब मेरे साथ जाएंगे। सेवानिवृत्ति मतलब अंत नहीं, बल्कि एक नया अध्याय है- जहां मैं अब परिवार के साथ समय बिताऊंगी, लेकिन वो 41 वर्ष का सफर हमेशा मेरे सीने में धड़केगा।




